सात घड़े
एक गाँव में एक छोटा व्यापारी था। उसके मन में बड़ा व्यापारी बनने की तीव्र अभिलाषा थी। लेकिन वह यह कला बिलकुल नहीं जानता था कि सब व्यापारियों से अधिक धन कैसे कमाया जाय!
एक दिन वह माल खरीदने शहर की ओर जा रहा था। धूप अधिक थी, इसलिए रास्ते में एक पेड़ की छाया में बैठकर धन कमाने के बारे में सोचने लगा।
इतने में ऊपर से उसे यह सवाल सुनाई दिया - "क्या तुम्हें सात घड़ों का सोना चाहिए?"
व्यापारी ने अचरज में आकर अपना सिर उठाकर ऊपर देखा। मगर उसे कोई दिखाई नहीं दिया। फिर भी वह प्रसन्नता के साथ ऊपर देखते बोला - "महाशय, मैं नहीं जानता कि आप कौन हैं? मुझ पर दया करके यदि आप मेरा उपकार करना चाहें तो मैं उसे स्वीकार करने से कैसे इनकार कर सकता हूँ? सात घड़ों का सोना ज़रूर दिला दीजिए।"
इसके उत्तर के रूप में पेड़ पर से ये बातें सुनाई दीं - "घर जाकर देख लो, सात घड़ों का सोना तुम्हारे घर में होगा।"
व्यापारी झट उठ बैठा और दौड़ते अपने घर पहुँचा। उसके घर में सचमुच सात घड़ों में सोना था, मगर छै घड़ों में सोना भरा पड़ा था, किंतु सातवें घड़े में आधा ही भरा था। व्यापारी यह सोचकर खुश नहीं हुआ कि छै घड़ों में सोना भरा हुआ है, पर वह इस बात की चिंता करने लगा कि सातवें घड़े में आधा ही सोना है। उसे लगा कि सातवें घड़े को भी सोना से भर दे, तभी जाकर उसकी चिंता दूर हो जाएगी।
उसने उसी वक़्त अपनी पत्नी के बदन से सारे गहने उतरवाकर घड़े में डाल दिया! मगर तब भी घड़ा भरा न था।
उसी गाँव में एक ज़मीन्दार था। वह व्यापारी के बचपन का मित्र था। इसलिए व्यापारी ने ज़मीन्दार के घर जाकर कहा - "मैं खतरे में फंसा हुआ हूँ। मुझे कर्ज दे दो।" यों कहकर उसने ज़मीन्दार से काफ़ी रुपये लिये और उन रुपयों से सोना खरीद कर घड़े में डाल दिया। फिर भी घड़ा नहीं भरा।
इसके बाद व्यापारी ने कांजी पीना तक बंद किया और फटे-पुराने कपड़े पहनकर भीख मांगने चल पड़ा।
एक दिन भीख मांगते वह ज़मीन्दार को दिखाई दिया। वह फटे-पुराने कपड़े पहने सूखकर काँटा हो गया था। इस हालत में व्यापारी को देख ज़मीन्दार आश्चर्य में आ गया। उसकी समझ में न आया कि थोड़ी-बहुत ज़मीन-जायदाद के होते हुए भी व्यापारी क्यों भीख मांग रहा है? उसने व्यापारी को निकट बुलाकर पूछा - "अबे, तुमने कहीं मूर्खता में आकर सात घड़े नहीं लिये हो न?"
व्यापारी ने विस्मय में आकर ज़मीन्दार से पूछा - "भाई साहब! यह बात तुम्हें कैसे मालूम हो गयी?"
"यह कोई बड़ी रहस्य की बात नहीं है। मैंने सात घड़े लेनेवाले कई लोगों को देखा है। उन में से एक भी नहीं सुधरा। जल्दी तुम उन से पिंड छुड़ा लो।" ज़मीन्दार ने सलाह दी।
व्यापारी उसी वक़्त उस पेड़ के नीचे गया और चिल्लाकर बोला - "भगवन, मुझे ये सात घड़े नहीं चाहिए। तुम्हीं वापस ले लो।"
इसके बाद व्यापारी ने घर लौटकर देखा, सात घड़े न थे। उनके साथ ही साथ व्यापारी ने सातवें घड़े में अपना जो सोना डाल दिया था, वह भी गायब हो गया था। लोभ की वजह से वह अपना सब-कुछ खो बैठा।