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सच्ची शिक्षा

यह बहुत प्राचीन समय की बात है। ज्ञानप्रिय नाम का एक युवक बचपन में ही काशी चला गया और गुरु की सेवा करके सभी विद्याओं को सीखकर उसमें निपुण हो गया। उसकी विद्वत्ता और शास्त्रों के ज्ञान की सभी प्रशंसा करने लगे। परंतु ज्ञानप्रिय को स्वयं में किसी कमी का आभास होता था। वह सोचने लगा— "मैंने सभी विद्याएँ सीखकर उनमें कुशलता तो प्राप्त कर ली है, परंतु इनमें से एक भी विद्या जीविकोपार्जन (पेट भरने) के लिए उपयोगी नहीं लगती। मेरी शिक्षा में निश्चित रूप से कोई कमी है। वह कमी क्या है, यह जाने बिना विवाह करने का क्या लाभ?" वह कई विद्वान लोगों से मिला और अपनी सीखी हुई सभी विद्याओं का वर्णन करके उनसे पूछा— "अब मुझे यह बताइए कि शिक्षा पूर्ण करने के लिए मुझे और क्या सीखना चाहिए?" सभी ने एक ही उत्तर दिया— "अरे पागल, तुम्हारी सारी शिक्षा पूरी हो चुकी है!" परंतु एक वृद्ध सज्जन बोले— "बेटा, तुम्हारी शिक्षा में एक चीज़ की कमी रह गई है। वह शिक्षा तुम्हें देने वाला केवल एक ही व्यक्ति है— गाँव का लोहार, जो गाँव के आखिरी छोर पर रहता है। यदि तुम उसके पास कुछ दिन काम करोगे, तो तुम्हारी शिक्षा पूरी हो जाएगी।" ज्ञानप्रिय को उन वृद्ध की बात में सच्चाई लगी। अब मेरी शिक्षा पूर्ण होगी, यह सोचकर उसे परम आनंद हुआ। वह उस लोहार की खोज में निकल पड़ा। उसे लोहार का घर मिल गया। उसने प्रणाम करके लोहार से विनती की— "काका! मैं सभी विद्याएँ सीखकर आया हूँ, फिर भी ऐसा लगता है कि कुछ सीखना बाकी रह गया है। इसलिए मुझे कुछ ऐसा सिखाइए जो दुनिया में सुखी होने के काम आए!" लोहार ने ज्ञानप्रिय को भट्टी के पास बैठकर 'धौंकनी' चलाने का काम दिया। ज्ञानप्रिय उस अंधेरी जगह पर आग के पास बैठकर धौंकनी चलाने लगा। एक दिन बीता, एक हफ्ता बीता, एक महीना बीता और एक साल भी बीत गया। ज्ञानप्रिय धौंकनी चलाता रहा, परंतु लोहार ने उसे कोई दूसरा काम नहीं बताया। फिर भी ज्ञानप्रिय कुछ नहीं बोला। उसने सोचा कि मैं जिस काम के लिए आया हूँ, की लोहार काका को अच्छी जानकारी है; इसलिए बार-बार उन्हें याद दिलाना बुद्धिमानी नहीं है। परंतु जब एक साल और बीत गया और लोहार ने उसे कुछ और सिखाने की बात नहीं छेड़ी, तब उसने दुखी मन से पूछा— "गुरुदेव! मेरी शिक्षा का क्या..." "तुम धौंकनी चलाते रहो!" लोहार ने बस इतना ही उत्तर दिया। उसके बाद ज्ञानप्रिय ने लोहार को फिर कभी उस बात की याद नहीं दिलाई। इस तरह पाँच साल बीत गए। एक दिन जब ज्ञानप्रिय भट्टी के पास बैठकर धौंकनी चलाने ही वाला था, तभी लोहार ने आकर प्यार से उसकी पीठ थपथपाई। ज्ञानप्रिय ने विनम्रता से प्रणाम किया और पूछा— "गुरुदेव! क्या आज्ञा है?" लोहार बोला— "बेटा, तुम्हारी शिक्षा अब पूरी हो गई है! अब तुम घर जाओ, विवाह करो और गृहस्थाश्रम में कदम रखो। तुमने सभी विद्याओं में श्रेष्ठ विद्या— 'सहनशीलता' (धैर्य) सीख ली है।" ज्ञानप्रिय ने आनंद के साथ गुरु के पैर छुए और उनसे विदा लेकर घर चला गया। विवाह करके उसने अपना घर बसाया। उसका वैवाहिक जीवन सुखमय रहा और एक महान ज्ञानी के रूप में गाँव वाले उसका आदर करने लगे।