लक्ष्मी की विजय
विष्णु के मन में एक बार यह अहंकार हो गया कि वही समस्त सृष्टि के पालनकर्ता हैं। एक बार उन्होंने अपनी पत्नी लक्ष्मी से कहा— "देवी! सभी लोकपाल और दिक्पाल मेरे अधीन हैं। सभी प्राणियों की रक्षा मैं ही करता हूँ। मेरे भक्त कभी तुम्हारे मायाजाल में नहीं फँसते।"
यह सुनकर लक्ष्मी ने कहा— "यह सब आपका कोरा भ्रम है। समस्त सृष्टि की असली स्वामिनी और मूल आधार मैं ही हूँ। मेरी कृपा पर ही किसी का बड़प्पन या छोटापन निर्भर करता है। जिस पर मेरी कृपा होती है, सभी उसी का आदर करते हैं। आप चाहें तो इसकी परीक्षा कर सकते हैं।"
विष्णु ने उस चुनौती को स्वीकार कर लिया और दोनों मृत्युलोक (पृथ्वी) में योगी और योगिनी का भेष धारण कर निकल पड़े। एक गाँव में एक वैष्णव भक्त वैश्य (व्यापारी) रहता था। उस दिन तेज आँधी चलने लगी। पहले ओले गिरे और उसके पीछे मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। रास्ते पर चलने वाले लोग ठंड से कांपते हुए कहीं न कहीं आश्रय ढूँढने लगे। उसी तरह योगी का भेष धरे विष्णु कांपते हुए उस वैश्य के दरवाजे पर आए।
उस वैष्णव भक्त वैश्य ने योगी को घर के भीतर बुलाया और नम्रता से कहा— "योगीश्वर! यह आपका ही घर है। भीतर आइए और जिस कमरे में चाहें विश्राम कीजिए। मैं आपको पूरा घर दिखा देता हूँ।" योगी ने वैश्य के साथ पूरा घर देखा। एक कोने में एक छोटी सी कोठरी थी। उसे दिखाकर योगी ने कहा— "मुझे यह कमरा पसंद है। मैं यहीं रहूँगा।"
वैश्य बोला— "योगीश्वर! अरे, इस कमरे में तो हमने घर का फालतू कूड़ा-कबाड़ रखा है। इस कबाड़ वाले कमरे में मैं आपको कैसे ठहरा सकता हूँ?" योगी ने कहा— "हम योगी लोग हैं, हमें एकांत चाहिए।" अंत में हारकर वैश्य ने वह कोठरी खाली कर दी और योगी के रुकने की व्यवस्था कर दी। योगी ने कमरे में जाकर भीतर से दरवाजा बंद कर लिया। तब विष्णु के मन में विचार आया— "मेरे भक्त ने मुझे तो आश्रय दे दिया, पर बेचारी लक्ष्मी का क्या होगा? उसे कौन आश्रय देगा? उसे तो पक्का हार माननी ही पड़ेगी।"
इतने में योगिनी के भेष में लक्ष्मी उसी वैश्य के घर के सामने आकर कांपती हुई खड़ी हो गईं। वैश्य उनका रूप और लावण्य देखकर दंग रह गया। वह बाहर आया और बोला— "माते योगिनी! इस भयंकर ठंड में आप ऐसे खुले में क्यों घूम रही हैं? अगर आपको आपत्ति न हो तो मेरे घर में थोड़ा विश्राम कर लीजिए!"
योगिनी भीतर आकर बोलीं— "मुझे बहुत प्यास लगी है।" वैश्य ने नौकर से पानी मँगवाया। योगिनी ने अपनी झोली से एक सोने का रत्नजड़ित प्याला निकाला, उसमें पानी डाला और पानी पीकर वह कीमती प्याला बाहर फेंक दिया। फिर बोलीं— "मुझे और पानी चाहिए।" वैश्य चकित होकर पूछने लगा— "माते योगिनी! आपने वह सोने का प्याला ऐसे क्यों फेंक दिया?" योगिनी ने कहा— "हम जिस प्याले से एक बार पानी पी लेते हैं, उसे दोबारा मुँह नहीं लगाते। और पानी मँगवाइए।"
इस तरह योगिनी ने चार-पांच प्याले पानी पिया और हर बार सोने का प्याला फेंक दिया। यह सब देखकर वैश्य के आश्चर्य की सीमा न रही। वैश्य की पत्नी तीन-चार साल पहले ही मर चुकी थी। उसने सोचा कि अगर यह योगिनी मुझसे विवाह कर ले और मेरी पत्नी बनकर रहने को तैयार हो जाए, तो कितना अच्छा होगा। उसने योगिनी से कहा— "माते! आपके कपड़े भीगकर तर हो गए हैं। आप कपड़े बदलकर भोजन कर लीजिए और जितना समय चाहें विश्राम कीजिए। इस घर को अपना ही समझिए और जो कमरा आपको पसंद हो, उसमें जितने दिन चाहें रहिए।"
योगिनी ने वैश्य के साथ पूरा घर देखा। फिर उस कोठरी के पास खड़ी होकर, जहाँ योगी ठहरा था, बोलीं— "जरा देखूँ यह कमरा कैसा है! यही मेरे रहने लायक है।" वैश्य बोला— "पर माते! यह कमरा आपके लायक नहीं है। इसके अलावा, अभी थोड़ी देर पहले ही यहाँ एक योगी ठहरे हैं। आप कोई दूसरा कमरा देख लीजिए।" लेकिन योगिनी उसी कमरे के लिए अड़ गईं। तब वैश्य ने बाहर से दरवाजा खटखटाया और कहा— "योगीराज! आप यह कमरा खाली कर दीजिए और दूसरे कमरे में चले जाइए।"
भीतर से योगी ने उत्तर दिया— "मैं इस समय योगासन कर रहा हूँ। अपनी जगह से हिल नहीं सकता। मैं इसी कमरे में रहूँगा।" वैश्य ने योगिनी से दूसरे कमरे में रहने का आग्रह किया, पर वह उसी कमरे के लिए जिद्द करती रहीं। वैश्य ने फिर दरवाजा खटखटाया और योगी से दूसरा कमरा लेने को कहा, पर योगी ने साफ मना कर दिया। अब वैश्य को गुस्सा आ गया। उसने अपने नौकरों को बुलाया, धक्का देकर दरवाजा खुलवाया और कहा— "इस योगी को बाहर निकालो।"
वैश्य के नौकरों को योगी का हाथ पकड़कर बाहर निकालते देख योगिनी हँसने लगीं। फिर उन्होंने वैश्य से कहा— "आप जाकर मेरे लिए भोजन परोसिए।" वैश्य रसोई में जाकर तैयारी करने लगा। वैश्य के जाते ही योगिनी कमरे से बाहर आईं और योगी (विष्णु) से बोलीं— "देखा मेरा प्रताप? पूरे संसार पर किसका अधिकार है?" विष्णु ने कोई उत्तर नहीं दिया।
दोनों बिना किसी से कुछ कहे मंदिर की ओर चले गए। वह विष्णु का ही मंदिर था, जिसे एक राजा ने बनवाया था। नियम के अनुसार मंदिर निश्चित समय पर ही खुलता और बंद होता था। मंदिर देखकर विष्णु को लगा कि यहाँ लक्ष्मी की दाल गलना मुश्किल है, क्योंकि वहाँ का राजा और प्रजा सभी परम विष्णुभक्त थे। विष्णु ने कहा— "देवी! हम यहाँ कुछ दिन रहें तो कैसा रहेगा?" लक्ष्मी बोलीं— "स्वामी! मैं आपकी दासी हूँ, आपकी इच्छा ही मेरी इच्छा है। पर यह मत समझिएगा कि यहाँ आपको मुझसे ज्यादा मान मिलेगा। जीत अंत में मेरी ही होगी।"
दूसरे दिन सुबह पुजारी ने पूजा शुरू की। भक्त दर्शन के लिए आने लगे। सबने विष्णु के स्तोत्र गाए, पर किसी ने लक्ष्मी का नाम तक नहीं लिया। विष्णु की खुशी का ठिकाना न रहा। दोपहर होते ही राजा की आज्ञा से मंदिर बंद हो गया।
विष्णु ने लक्ष्मी को चिढ़ाते हुए कहा— "देवी! देखा, किसी ने तुम्हारा नाम तक नहीं लिया। अब बोलो, संसार पर मेरा अधिकार है या नहीं?" लक्ष्मी ने मुस्कुराकर कहा— "इतनी देर तक भक्तों को दर्शन देकर आप थक गए होंगे, अब थोड़ा विश्राम कीजिए।"
उसी समय राजा के मन में विचार आया कि पुजारी मंदिर के नियमों का पालन ठीक से करता है या नहीं। वह व्यापारी का भेष बदलकर मंदिर आया और पुजारी से बोला— "भटजी! मैं दर्शन के लिए आया हूँ, मंदिर खोलिए।" पुजारी ने कहा— "सेठजी, दोपहर के बारह बजे के बाद गर्भगृह नहीं खुलता। अब शाम चार बजे ही दर्शन होंगे।" व्यापारी बोला— "अरे भटजी, इसमें राजाज्ञा कैसी? मुझे चुपके से दर्शन करा दीजिए। मैं परदेसी हूँ और मंदिर को एक हजार रुपये दान दूँगा।" व्यापारी पुजारी के सामने लालच देने लगा।
पुजारी को लगा कि सामने आई लक्ष्मी (धन) को ठुकराना समझदारी नहीं है। उसने सोचा कि राजा को कैसे पता चलेगा? उसने व्यापारी को भीतर बुला लिया। व्यापारी ने एक के बदले दो हजार रुपये मंदिर में चढ़ाए और चला गया।
बाद में राजा ने पुजारी को दरबार में बुलाया और पूछा— "क्यों भटजी, पूजा-पाठ समय पर हो रहा है ना? नियमों का उल्लंघन तो नहीं होता?" पुजारी को शक हुआ कि उसकी चोरी पकड़ी गई है। उसने चालाकी से जवाब दिया— "महाराज, सब नियम से ही होता है। पर सोचिए, अगर आप विश्राम कर रहे हों और स्वयं महारानी सरकार आ जाएँ, तो क्या पहरेदार दरवाजा नहीं खोलेंगे? वैसे ही, जब स्वयं साक्षात् लक्ष्मी माता मंदिर में आना चाहें, तो हमें दरवाजा खोलना ही पड़ता है!" राजा इस चतुर उत्तर से खुश हुआ और उसने पुजारी को दो हजार रुपये का इनाम और दे दिया।
इस प्रकार विष्णु को लक्ष्मी के सामने हार माननी पड़ी। लक्ष्मी ने कहा— "स्वामी! आप मेरी माया को पूरी तरह नहीं समझ पाए। सृष्टि के आरंभ से ही यह अधिकार मेरा है। जो कुछ दिखता है और जो नहीं दिखता, वह सब मेरी ही कृपा से चल रहा है। वास्तव में पुरुष की शक्ति स्त्री ही है। आपमें जो शक्ति (लीला) है, वह मैं ही तो हूँ। इसलिए मेरी पराजय का तो सवाल ही नहीं उठता।"