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रंगनाथ की शादी

रंगनाथ पच्चीस साल का हो गया था, फिर भी वह कोई भी काम जिम्मेदारी से करने के लायक नहीं था। पिता ने उसे बहुत लाड़-प्यार में पाला था। पढ़ाई-लिखाई में भी वह औसत ही था। आवारागर्दी उसके स्वभाव में बस गई थी और घर की आर्थिक स्थिति भी सामान्य ही थी। लेकिन वह दिखने में बहुत गोरा-चिट्टा और सुंदर था। इसलिए कुछ लोग उसे अपनी बेटी देने के लिए तैयार थे। रंगनाथ के जान-पहचान वाले उससे कहते— "यह देखो भाई, अगर तुम कोई अच्छी नौकरी करने लगो, तो अप्सरा जैसी लड़कियां तुम पर मर मिटेंगी।" रंगनाथ उनसे कहता— "क्या मेरे पिताजी मेरे साथ एक और व्यक्ति को खाना नहीं खिला सकते?" एक बार उसका एक दोस्त पड़ोस के गाँव में एक लड़की देखकर आया और उस लड़की का वर्णन करने लगा। उसने कहा— "अरे क्या बताऊं, बहुत ही शानदार लड़की है! और तो और, उसकी माँ के पास बहुत पैसा है। वह लड़की ही अपनी माँ की संपत्ति की इकलौती वारिस है। वह बुढ़िया दुर्गाबाई थोड़ी तुनकमिज़ाज (कड़क) है। उसने मुझसे कहा— 'मैं अपनी बेटी उसे ही दूंगी जो कामदेव का पुतला (अत्यंत सुंदर) हो।' तुम एक बार जाकर लड़की को देख तो लो! अगर तुम्हारी शादी उस लड़की से हो गई, तो तुम्हें नौकरी-वकरी की क्या ज़रूरत? तुम घर-जमाई बनकर रह सकोगे!" रंगनाथ को यह बात बहुत पसंद आई। अगले ही दिन वह अपने पिता को बताए बिना पड़ोस के गाँव चला गया। रंगनाथ को दुर्गाबाई का घर आसानी से मिल गया। दरवाजे की कुंडी खटखटाते ही दुर्गाबाई ने खुद आकर दरवाजा खोला और पूछा— "कौन हो बेटा तुम? लगता है मेरी बेटी रानी को देखने आए हो?" दुर्गाबाई थोड़ी भारी शरीर की एक विधवा महिला थीं। रंगनाथ ने हाँ में सिर हिलाया। "बेटा रानी! अरी इधर आ, देख तुझे देखने कौन आया है!" दुर्गाबाई ने बेटी को बुलाया। रानी पढ़ रही थी, वह हाथ में किताब लिए आई और चिड़चिड़े स्वर में बोली— "फिर वही शादी की बातें!" रंगनाथ उस लड़की को देखकर दंग रह गया। "आपका नाम क्या है? कहाँ रहते हैं? कहाँ तक पढ़ाई की है?" रानी ने एक के बाद एक कई सवाल दाग दिए। रंगनाथ ने उन सवालों के सही जवाब दिए। जवाब सुनकर रानी घर के अंदर चली गई। उसके बाद दुर्गाबाई रंगनाथ से बोली— "बेटा, अब तुम जाओ! हम जल्द ही अपना फैसला बता देंगे।" उस घर की शानो-शौकत, रानी की सुंदरता और उसके तीखे सवालों को देखकर रंगनाथ को लगा कि यह लड़की उसकी किस्मत में नहीं है। लेकिन ठीक एक हफ्ते बाद दुर्गाबाई ने रंगनाथ के घर संदेश भेजा— "हमें आपके बेटे का रिश्ता मंजूर है, मुहूर्त आदि तय करने के लिए आ जाइए।" रंगनाथ के पिता को इस बारे में कुछ पता ही नहीं था। पूछताछ करने पर उन्हें पता चला कि लड़की के घर की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी है। लड़की के पिता नहीं हैं और न ही कोई भाई है। लोगों ने उनसे कहा— "यह रिश्ता हाथ से मत जाने दीजिए! घर आई लक्ष्मी को वापस मत भेजिए!" जल्द ही रंगनाथ की शादी बड़ी धूमधाम से हो गई। चार-पाच दिन ससुराल में रहने के बाद रंगनाथ के पिता अन्य रिश्तेदारों के साथ घर लौट आए। रंगनाथ को लगा कि उसकी सास उसे घर-जमाई बनाकर रखेगी। इसलिए वह अपनी पत्नी को लेकर वापस नहीं गया। लेकिन एक दिन बातचीत के दौरान दुर्गाबाई उससे बोली— "दामाद जी, आपको तो पता ही होगा! पाटिल का दूसरा दामाद महीने में पंद्रह दिन ससुराल में ही रहता है और दावतें उड़ाता है। अगर पाटिल की जगह मैं होती, तो उसे लात मारकर घर से बाहर निकाल देती!" यह सुनकर रंगनाथ के होश ठिकाने आ गए। उसे समझ आ गया कि उसकी सास उसे घर-जमाई बनाकर रखने को तैयार नहीं है। दो-तीन दिनों बाद रंगनाथ ने अपनी महानता दिखाते हुए कहा— "मामी (सास), अब आप इस उम्र में अकेले कब तक रहेंगी? आप हमारे साथ चलिए ना, हमारे ही घर रहिए!" लेकिन उसकी सास बोली— "बेटा, जिसे जहाँ रहना शोभा देता है, उसे वहीं रहना चाहिए, तभी उसका सम्मान बना रहता है। मैं अभी केवल पचास साल की हुई हूँ। कल का दिन यात्रा के लिए शुभ है, आप लोगों का अब निकलना ही ठीक रहेगा।" न चाहकर भी रंगनाथ रानी को लेकर अपने गाँव लौट आया। अब तक वह अकेला था, इसलिए बेपरवाह रहता था। लेकिन अब रानी की जिम्मेदारी उसके कंधों पर थी। अपनी पत्नी का खर्च पिता पर डालना उसे अपमानजनक लगने लगा। इसलिए उसने एक दिन अपनी पत्नी से कहा— "मैं सोच रहा हूँ कि कोई व्यापार शुरू करूँ। तुम पूँजी के लिए अपनी माँ से पाँच हजार रुपये माँग लाओ।" रानी हंसी और बोली— "रेत से तेल निकालना मुमकिन हो सकता है, लेकिन मेरी माँ के हाथ से एक पैसा निकलवाना नामुमकिन है।" फिर भी रंगनाथ ने किसी के हाथ सास को संदेश भेजा कि उसे व्यापार के लिए पाँच हजार रुपयों की जरूरत है। दुर्गाबाई ने तुरंत जवाब भेजा— "जिसके पास व्यापार करने लायक पैसे नहीं हैं, उसे व्यापार में उतरने की जरूरत ही क्या है? उससे कहो, कहीं नौकरी करे। मैंने सोने की गुड़िया जैसी बेटी उसे दी है! अब उसे एक पैसे की भी उम्मीद रखना शोभा नहीं देता!" वह संदेश सुनकर रंगनाथ निराश हो गया। उसने सोचा कि आलसियों की तरह बैठे रहने से काम नहीं चलेगा। जो पुरुष पैसे नहीं कमाता, उसकी परवाह उसकी पत्नी भी नहीं करती। उम्र भर दूसरों के भरोसे रहकर अपनी नजरें नीची करना मूर्खता है। ऐसा सोचकर रंगनाथ ने काम की तलाश शुरू की और एक महीने के भीतर उसे जीवन के वास्तविक सुख का अनुभव हुआ। इससे पहले उसे जीवन एक बोझ लगता था। कभी-कभी उसे खुद पर गुस्सा आता था। लेकिन अब उसका उत्साह बढ़ गया था। एक साल बीत गया और रंगनाथ पिता बना। अपनी नातिन को देखने के लिए दुर्गाबाई दौड़ती हुई आईं। नातिन के गले में सोने की माला डालते हुए उन्होंने रंगनाथ से कहा— "बेटा, तुम में कितना बदलाव आ गया है, मुझे यह देखकर बहुत खुशी हुई। तुम दिखने में सुंदर हो और तुम्हारा परिवार भी प्रतिष्ठित है। लेकिन पूछताछ करने पर मुझे पता चला था कि तुम आलसी बनकर घर में बैठे रहते हो और अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते। फिर भी मैंने अपनी बेटी की शादी तुमसे इस विश्वास पर की थी कि जब कंधे पर जिम्मेदारी आएगी, तो तुम अपने आप सुधर जाओगे। तुम्हारा आलस दूर करने के लिए ही मैंने यह कठोरता दिखाई थी। मेरे पास जो कुछ भी है, क्या मैं उसे अपने साथ ऊपर ले जाऊंगी? यह सब तुम लोगों का ही तो है!" यह सुनकर रंगनाथ ने आत्मविश्वास के साथ कहा— "मैं जो कमा रहा हूँ, वह मेरे परिवार का गुजारा खुशी-खुशी चलाने के लिए काफी है। अगर आप कुछ देना ही चाहती हैं, तो अपनी नातिन को दीजिए!"