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भगवान से बड़ा मानव

रत्नाकर देश पर मणिकंठ राजा शासन करता था। उसकी कुशलता के कारण उसका राज्य चारों तरफ़ खूब फैल गया। इस वज़ह से कोने में रहनेवाले लोगों के सुख-दुखों का पता लगाना राजा के लिए मुश्किल मालूम हुआ। इस समस्या के बारे में राजा मणिकंठ ने अपने मंत्रियों की सलाह माँगी। इस पर मंत्रियों ने सलाह दी कि देश को चार प्रमुख भागों में बाँटा जाय और प्रत्येक भाग पर एक योग्य प्रतिनिधि को नियुक्त किया जाय। राजा ने अपने राज्य को चार भागों में बाँट दिया और प्रत्येक भाग पर एक-एक विश्वास पात्र प्रतिनिधि को नियुक्त किया। चारों राज प्रतिनिधि प्रति मास अपने-अपने प्रदेश की प्रजा की असुविधाओं का उल्लेख करते हुए उन्हें दूर करने के लिए लिए जाने वाले निर्णयों का ब्यौरा राजा की सेवा में भेजा करते थे। इस बात में कोई संदेह न था कि राज प्रतिनिधि राजा के प्रति श्रद्धा और भक्ति रखते हैं। लेकिन इसी कारण से थोड़ी उलझनें पैदा हो गयीं। उनमें इस बात की स्पर्धा बढ़ गयी कि अपने-अपने प्रदेश को शेष तीनों प्रांतों से समृद्ध बनाया जाय! जनता में उत्साह पैदा करने के लिए उन प्रतिनिधियों ने प्रांतीय तत्वों को उभाड़ दिया। राज्य भर के सभी लोग एक जाति के न थे। गणराज्य होने के कारण एक जाति के लोग दूसरी जाति के लोगों के साथ हर छोटी-सी बात को लेकर झगड़ा करते थे। मगर सभी प्रदेश एक ही शासन के अंतर्गत आ जाने के कारण जाति-वैषम्य एक प्रकार से दब गये थे। मगर इन नये राज प्रतिनिधियों ने आपस में स्पर्धा करके जाति-वैषम्य पैदा होने का मौक़ा दिया। अलावा इसके जिस प्रांत में जो पैदावार होती थी, उसे दूसरे प्रांत में जाने से राज प्रतिनिधियों ने रोक दिया। राज्य की उत्तरी दिशा में कपास ज़्यादा पैदा होता था, मगर बुनाई में दक्षता रखने वाली जातियाँ दक्षिणी दिशा में फैली थीं। जब राज्य एक इकाई के रूप में था, तब उत्तरी दिशा का कपास दक्षिण के बुनकरों को आसानी से प्राप्त हो जाता था। मगर अब उत्तर के राजप्रतिनिधि ने अपने प्रांत में पैदा होनेवाले कपास को दक्षिण में जाने से रोका और अपने ही प्रदेश के लोगों को बुनाई सीखने पर ज़ोर दिया। ऐसी हालत में दक्षिण के प्रतिनिधि ने अन्य पैदावार ठीक से उपजने वाले खेतों में कपास पैदा करने का आदेश दिया। इस वज़ह से जहाँ अच्छे बुनकर थे, वहाँ अच्छे क़िस्म का कपास पैदा नहीं हुआ और जहाँ अच्छे क़िस्म का कपास पैदा होता था, वहाँ अच्छे बुनकर नहीं रहे, परिणामस्वरूप वस्त्रों का स्तर बिल्कुल गिर गया। यही हालत लोहे के उद्योगों की भी हो गयी। देश की पूर्वी दिशा में बढ़िया लोहे की खानें थीं। पर पश्चिमी दिशा में कुशल लौहकार कारीगर थे। पूर्वी दिशा के राज प्रतिनिधि ने अपने यहाँ के लोहे को पश्चिम में भेजने पर प्रतिबंध लगाया और अपने ही प्रदेश में लोहे के कारीगरों को शिक्षण देना प्रारंभ किया। इस कारण पश्चिम के राज प्रतिनिधि ने लाचार होकर पड़ोसी देशों से अधिक दाम देकर लोहा खरीदना शुरू किया। केन्द्र में रहनेवाले राजा के पास राज प्रतिनिधियों से जो रिपोर्टें मिलती थीं, उन्हें देखने पर राजा को लगता कि उनके प्रतिनिधि यथाशक्ति देश की उन्नति के लिए प्रयास कर रहे हैं। मगर राजा जानता था कि देश का विकास नहीं हो रहा है। परंतु कमी कहाँ थी, यह बात राजा की समझ में न आती थी। राज प्रतिनिधियों को नियुक्त करके पांच साल बीत गये थे। पर देश पहले की तरह तरक्की नहीं कर पाया, उल्टे पहले की तरक्की रुक गयी है और देश में एक प्रकार से स्तब्धता छा गयी है। इसका कारण जानने के लिए राजा ने राजधानी में विभिन्न प्रकार की गोष्ठियों का इंतज़ाम किया। एक गोष्ठी में भाषण देते हुए सभी व्यापारियों ने बताया कि गत पांच सालों के भीतर व्यापार में खूब विकास हो गया है। इसी प्रकार उद्योगपतियों ने बताया कि उद्योगों की उन्नति पहले की अपेक्षा कहीं अधिक हुई है। ये सारे भाषण सुनने के बाद राजा की समझ में न आया कि इस उन्नति को देख उसे खुश होना है या देश में विकास न होने पर चिंता करनी है। अंत में एक दिन पंडितों की गोष्ठी हुई। उस गोष्ठी में शशिभूषण नामक पंडित ने अपनी असाधारण प्रतिभा का परिचय देकर राजा से पुरस्कार भी प्राप्त कर लिया। पुरस्कार प्रदान करते राजा ने शशिभूषण से पूछा— "पंडित जी, मैं आपसे पांडित्य संबंधी प्रश्न नहीं पूछूंगा, मगर बहुत समय से एक समस्या मेरे मन को व्याकुल बना रही है, क्या आप उसका समाधान दे सकेंगे?" "पूछिये, महाराज! मैं यथाशक्ति उत्तर देने का प्रयत्न करूँगा।" शशिभूषण ने जवाब दिया। "इस संसार की सृष्टि भगवान ने की है, इसलिए हम भगवान को सबसे बड़ा मानते हैं। मगर क्या भगवान से भी कोई बड़ा आदमी है?" राजा ने पूछा। "क्यों नहीं है, महाराज? भगवान से भी बड़ा व्यक्ति मानव है!" शशिभूषण ने झट जवाब दिया। राजा ने विस्मय में आकर कहा— "जवाब देने मात्र से आपकी जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती, उसे साबित भी करना होगा।" शशिभूषण ने विनयपूर्वक कहा— "मैंने अपने अनुभव के आधार पर यह उत्तर दिया है। महाराज, भगवान ने मेरे ललाट पर पांडित्य का संपादन करने को लिखा था। उसके आधार पर मैं उत्तर प्रदेश में शिक्षक के रूप में युवकों को शिक्षा दे रहा था। मगर मैं पूर्वी प्रदेश का निवासी था, इस कारण मुझे अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। इसलिए मैंने जो शिक्षा प्राप्त की थी, उसे युवकों में बांटने के काम को तिलांजलि दी और फिलहाल खेती करके जीविका चला रहा हूँ। भगवान ने मेरे ललाट पर जो भाग्य रेखाएँ खींच दी थीं, उन्हें मानव ने मिटा दिया। अब आप ही बताइये कि इन दोनों में से कौन बड़ा है?" शशिभूषण की बातें सुनने पर राजा की आँखें खुल गयीं। जो राज्य एक इकाई के रूप में रहना चाहिए था, वह चार छोटे राज्यों में बंट गया है। इस समस्या पर राजा ने फिर से मंत्रियों के साथ चर्चा की। मंत्रियों ने गंभीरतापूर्वक विचार करके यों सुझाव दिये— "महाराज, बड़े राज्य को छोटे खण्डों में विभाजित करने में कोई गलती नहीं है। प्रांतीय भावनाओं के बढ़ने का कारण जिस प्रांत का प्रतिनिधि उसी प्रांत के निवासी का होना है। हम यह भी नहीं कह सकते कि हमारे राज प्रतिनिधि दुष्ट और असमर्थ हैं। मगर एक प्रांत के व्यक्ति को दूसरे प्रांत का राज प्रतिनिधि नियुक्त किये होते तो यह बुरी हालत न हुई होती। इसलिए उनका स्थान-परिवर्तन करवा दीजिए। यह समस्या अपने आप सुलझ जाएगी। तब जनता अपने को एक ही देश का नागरिक मान कर चलेगी। इससे विविध प्रांतों के बीच की यह स्पर्धा मिट जाएगी और उनके बीच सहयोग और सहकार की भावना बढ़ेगी।" राजा ने इन सुझावों को अमल किया और देश की उन्नति का रास्ता खोल दिया।