Bookstruck

चमत्कार का सत्कार

शहर जाने वाले रास्ते के किनारे एक पेड़ की छाया में दो आदमी सो रहे थे। उनकी गठरियों का पहरा तीसरा आदमी दे रहा था। उस वक्त वहाँ पर कोई अजनबी आया और उन लोगों से थोड़ी दूर पर एक पेड़ की छाया में जा बैठा। उस आगंतुक की पोशाकें देखने पर वह कोई अमीर जैसा लग रहा था। उस आदमी ने पहरा देने वाले आदमी की ओर तथा सोने वाले आदमी की ओर नजर दौड़कर देखा। उसे लगा कि वे तीनों आदमी गरीब हैं। अमीर ने उन लोगों से पूछा— "तुम लोग कौन हो?" पहरा देने वाले व्यक्ति ने सोने वाले एक आदमी की ओर इशारा करके बताया— "वह अन्न की याचना न करने वाला है।" फिर दूसरे आदमी की ओर संकेत करके कहा— "वह आदमी चाहकर भी न पाने वाली चीज़ों के अभाव में जीने का रास्ता न जानने वाला है। हम तीनों शांति के साथ अपने दिन काटने के लिए यहाँ पर आये हैं! रखने की चाह रखते हुए न रहने वाली चीज़ों से याचना करते हुए, रुकने की प्रार्थना करने पर न रुकने वाली चीज़ के साथ अपने दिन बिता रहे हैं।" ये चमत्कारपूर्ण बातें सुनकर अमीर आदमी बड़ा खुश हुआ और उनके हाथ थोड़ा सा धन देकर बोला— "मैं इस देश के राजा के निकट व्यक्तियों में से एक हूँ। कल तुम लोग दरबार में आकर राजा के दर्शन कर लोगे तो वे तुम्हें उचित पुरस्कार देंगे।" इसके बाद उन्हें दरबार में प्रवेश करने के लिए अनुमति-पत्र देकर अमीर अपने रास्ते चला गया। दूसरे दिन राजा सत्यवान ने अपने दरबारियों के सामने कुछ सवाल रखे— "अन्न की याचना न करने वाला कौन है? चाहकर भी न पा सकने वाली चीज़ क्या है? मनुष्य शांति के साथ कब रह सकता है? रखने की चाह करने पर भी न रहने वाली चीज़ क्या है? रुकने की प्रार्थना करने पर भी न रुकने वाली चीज़ क्या है? इन सवालों का उचित जवाब देने वालों को बढ़िया पुरस्कार दिया जाएगा!" ये सवाल सुनकर सभी दरबारी एक दूसरे का चेहरा देखने लगे। पर किसी को भी इन सवालों के सही जवाब न सूझें। राजा थोड़ी देर रुककर बोले— "हमारे दरबारियों में कई पंडित हाजिर हैं, मुझे आश्चर्य होता है कि ऐसे महान पंडित भी इन सवालों के जवाब नहीं दे पा रहे हैं!" इतने में एक सेवक ने प्रवेश करके निवेदन किया— "महाराज, तीन आदमी आपके दर्शन करने के लिए आये हुए हैं। वे लोग अपने साथ दरबार में प्रवेश करने के लिए अनुमति-पत्र ले आये हैं!" इस पर राजा ने उन्हें दरबार में हाजिर करने की आज्ञा दे दी। वे तीनों दरबार में पहुँचे। राजा ने उनकी ओर प्रश्नार्थक दृष्टि दौड़ाई। इस पर एक आदमी ने कहा— "महाराज, मेरा नाम वीरभद्र है! महाराज के सामने अपने पांडित्य का प्रदर्शन करके पुरस्कार पाना चाहा, मगर आज तक मुझे दरबार में प्रवेश करने की अनुमति नहीं मिली। मैं अपने पिता और भाई को साथ लेकर पेट न भर सकने वाले थोड़े अन्न के साथ अपने दिन काट रहा हूँ। भाग्यवश कल एक अमीर ने हमारी मदद की और दरबार में प्रवेश करने का अनुमति-पत्र दिया, इसीलिए आज हम आपकी सेवा में हाजिर हो सकें!" इस पर राजा के अंतरंग सलाहकार ने अपने आसन से उठ खड़े होकर कहा— "प्रभु! मैंने इसी व्यक्ति के बारे में आपसे कल निवेदन किया था।" उस समय सारे दरबार में कानाफूसी शुरू हुई। एक वृद्ध व्यक्ति ने राजा के समीप जाकर निवेदन किया— "महाराज, आपने इसके पहले दरबारियों के सामने जो सवाल रखे, उनका जवाब मेरी पोती दे सकती है। कृपया उसे मौका दीजिए!" वृद्ध ने क्रोधपूर्ण आँखों से दरबारियों की ओर देख राजा से कहा— "महाराज, हमारे दरबारी पंडित यह सोचकर प्रतिभाशाली नये व्यक्तियों को आपके दर्शन कराने से रोक रहे हैं कि कहीं उनके बड़प्पन में कलंक न लग जाय! इसी वजह से बड़ी विदुषी बनी मेरी पोती को आज तक आपके दर्शन करने का भाग्य प्राप्त न हुआ।" इसके बाद राजा ने एक सेवक को भेजकर वृद्ध की पोती को बुलवा भेजा। उसका नाम कात्यायनी था। उसके चेहरे के वर्चस्व को देख सारे दरबारी विस्मय में आ गये। राजा ने कात्यायनी के सामने अपने सारे सवाल रखे जो इसके पहले दरबारियों के सामने रखे थे। इस पर कात्यायनी ने थोड़ा भी विलंब किये बिना यों जवाब दिया— "महाराज, अन्न की याचना न कर सकने वाला व्यक्ति गूँगा है। तर्कपूर्ण विचार करने पर यह बात सबकी समझ में आ सकती है! चाहकर भी न पा सकने वाली चीज़ बुद्धिमत्ता है! क्योंकि बुद्धिमत्ता ज़्यादातर जन्म के साथ ही प्राप्त हो जाती है! हर एक आदमी निद्रा (नींद) के समय ही शांतिपूर्वक रह सकता है! रखने की चाह करके भी न रखी जाने वाली चीज़ मानव का शरीर है। अब रुकने की प्रार्थना करने पर भी न रुकने वाली चीज़ समय या काल है! इन बातों को वीरभद्र ने चमत्कारपूर्वक यों बताया है कि वह अपने गूँगे पिता तथा बुद्धिमत्ता न रखने वाले भाई के साथ याचना करते हुए ज़िंदगी के बोझ से दबा जा रहा है।" ये उत्तर सुनकर राजा के साथ राज-दरबारी भी प्रसन्न हुए, सबने हर्ष ध्वनि की। इसके बाद राजा ने वीरभद्र और कात्यायनी की दिल खोलकर प्रशंसा की और उनका भारी सत्कार किया।