चन्द्रभानु का गोदान
नरसिंहपुर गाँव में एक गृहस्थ रहता था, नाम था चन्द्रभानु। वह अव्वल दर्जे का कंजूस और संगदिल आदमी था। एक बार वह बीमार पड़ा। उसने अपनी बीमारी का इलाज कराया, पर कोई फ़ायदा न हुआ।
चन्द्रभानु की माँ शान्ता ने बेटे को समझाते हुए कहा— " बेटा, एक बार तुम्हारे पिता इसी प्रकार की बीमारी के शिकार हो गये थे। उन्होंने एक श्रेष्ठ ब्राह्मण को गोदान किया था। तुरन्त ही उनकी बीमारी अदृश्य हो गयी थी।"
"माँ, मेरी बीमारी का गोदान के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है।" चन्द्रभानु ने अपनी माँ की बात काटते हुए कहा। असली बात यह थी कि अपनी बीमारी के लिए चन्द्रभानु गोदान के खर्च में नहीं पड़ना चाहता था।
शान्ता ने फिर कहा— "बेटा, हम जो पाप करते हैं, वे ही हमें रोगों के रूप में सताते हैं। रोगों से हमें पुण्यकार्य करने की प्रेरणा और सीख लेनी चाहिए। यह एक चेतावनी है बेटा। तुम्हारा स्वभाव मुझसे छिपा नहीं है। तुम धन को केवल जोड़ना जानते हो, तुम्हें यह कंजूसी अपने स्वर्गवासी पिता से विरासत में मिली है।"
चन्द्रभानु के स्त्री-बच्चों ने भी गोदान करने के लिए उस पर ज़ोर डाला। विवश होकर चन्द्रभानु ने रामशर्मा नाम के एक ब्राह्मण को बुलवा भेजा और उसे एक गाभिन गाय दान देकर बोला— "शर्मा जी, जब गाय के बच्चा हो—बछड़ा या बछिया, तो आप उसे मुझे दे दीजियेगा। भला, आप उसका क्या करेंगे? वैसे भी मैं आप को केवल गाय दान में दे रहा हूँ।"
रामशर्मा ने कुछ विचलित होकर कहा— "साहू जी, माँ और बच्चे को अलग-अलग करना तो बड़ा पाप होगा।"
"देखिये, मनुष्य और पशु का न्याय अलग-अलग होता है। आप जिस न्याय या पाप की बात कर रहे हैं, वह मनुष्यों पर लागू होता है, पशुओं पर नहीं। फिर भी आप इतना कर सकते हैं कि गोवत्स जब दूध पीना बन्द कर दे, तभी आप उसे मुझे दें।" चन्द्रभानु ने कहा।
रामशर्मा ने चन्द्रभानु की बात स्वीकार कर ली और गाय को अपने घर हाँक ले गया। दूसरे ही दिन चन्द्रभानु की बीमारी इस तरह गायब हो गयी, मानो जादू हो गया हो।
कुछ दिनों बाद गाय ने बछड़ा दिया। यह बात मालूम होने पर चन्द्रभानु उसे पाने के लिए बेचैन हो उठा। वह प्रतिदिन रामशर्मा के घर बछड़े को देखने के बहाने जाने लगा। इसी तरह एक सप्ताह बीत गया। एक दिन चन्द्रभानु से रहा नहीं गया। उसने रामशर्मा से पूछा— "शर्माजी, गाय अच्छी तरह दूध दे रही है न?"
"साहू जी, यह गाय तो देवता अंशवाली है। हर रोज कम से कम चार सेर दूध देती है।" रामशर्मा ने कहा।
रामशर्मा स्वभाव से बड़ा संकोचशील ब्राह्मण था। उसने चन्द्रभानु को खुश करने के ख्याल से दो सेर दूध का बढ़ाकर चार सेर कर दिया था। रामशर्मा के मुँह से चार सेर का नाम सुनकर चन्द्रभानु का दिल धड़क उठा। उसके पास अपनी कई गायें थीं, पर कोई भी गाय इतना दूध नहीं देती थी। "शर्माजी, अगर यह गाय इतना अधिक दूध देती है तो मेरे विचार से उसके दूध में वह गुण, वह स्वाद तो नहीं होगा!" चन्द्रभानु ने पूछा।
अगर रामशर्मा यह उत्तर दे देता कि दूध गुण और स्वाद में हल्का है तो शायद चन्द्रभानु कुछ हद तक सन्तुष्ट अवश्य हो गया होता। कम से कम उसे एक उत्तम गाय से वंचित होने का दुख तो न होता। पर रामशर्मा में चन्द्रभानु जैसी चालाकी नहीं थी। उसने अपने यजमान को प्रसन्न करने के विचार से कहा— "साहू जी, आप ने जिस धार्मिक भावना से यह गाय मुझे दान दी है, उसके कारण इस गाय के दूध का स्वाद वर्णनातीत है। शायद अमृत इसी प्रकार का होता होगा।"
"अच्छा! तब तो इस दूध का स्वाद मुझे भी चखना चाहिए।" चन्द्रभानु ने बड़ी तत्परता से कहा। रामशर्मा ने तत्काल लोटा भर दूध मँगवाया और चन्द्रभानु को दिया। दूध सुस्वादु था। दूध पीकर चन्द्रभानु की चिन्ता और बढ़ गयी। वह घर लौट आया। उस पूरी रात उसे नींद नहीं आयी।
दूसरे दिन सुबह ही सुबह चन्द्रभानु ने रामशर्मा को बुलाकर कहा— "शर्माजी, मैं अजीब किस्म की बीमारी से पीड़ित हूँ। आप के यहाँ दूध पिया तो बड़ा आराम मिला। मुझे अब तो पूरा विश्वास हो गया कि सचमुच ही उस गाय के अन्दर देवता का अंश है। उसके दूध में निश्चय ही अमृत का प्रभाव है। आप ने कहा था कि गाय प्रतिदिन चार सेर दूध देती है, इसलिए मेरी विनती है कि आप हर रोज मेरे घर दो सेर दूध भेज दिया कीजिये। बस, जब मैं स्वस्थ हो जाऊँ, तब आप दूध बन्द कर दीजियेगा।"
चन्द्रभानु की बात सुनकर रामशर्मा हक्का-बक्का खड़ा रह गया। फिर भी वह कुछ प्रतिवाद नहीं कर पाया और 'अच्छा!' कहकर अपने घर चला गया। शान्ता ने जब अपने बेटे की करतूत सुनी तो उसे डाँट कर कहा— "बेटा! यह अधम काम है। अगर तुम गाय को दान करके उसका दूध लोगे तो तुम्हारा पुण्य नष्ट हो जायेगा ही और उल्ट तुम पाप के भागी बनोगे। तुम ऐसा मत करो!"
"अगर पुण्य नष्ट हो गया होता, तो मैं फिर से बीमारी का शिकार हो जाता। तुम चिन्ता मत करो!" चन्द्रभानु ने तर्क दिया। उस दिन से रामशर्मा गाय का पालक मात्र रह गया। सारा दूध चन्द्रभानु के घर जाने लगा।
कुछ दिन बीत गये। चन्द्रभानु पुनः बीमार पड़ा। उसने डर कर रामशर्मा से दूध लेना बन्द कर दिया। पर चन्द्रभानु की बीमारी घटी नहीं। वैद्य बराबर उसे दवाइयाँ देता, पर बीमारी ऐसी थी कि टलने का नाम नहीं ले रही थी। चन्द्रभानु अपनी कृपण बुद्धि से यही सोचता रहता कि जब मैंने रामशर्मा से दूध लेना बन्द कर दिया है तो मुझे क्यों नहीं ठीक होना चाहिए। वह अब भी अपने को गोदान के पुण्य का पूरा अधिकारी मानता था। एक दिन अचानक एक साधु आकर चन्द्रभानु के मकान के सामने खड़ा हो गया और बोला— "इस घर में पाप का निवास है। इस पाप से मुक्ति होनी चाहिए!"
साधु के शब्द सुनकर शान्ता ने उसे अन्दर बुलवाया और अपने पुत्र की बीमारी की जाँच करने का आग्रह किया। साधु ने चन्द्रभानु की जाँच करके और उसकी माँ शान्ता से सारा किस्सा सुनकर कहा— "तुम्ें गोदान का पुण्य प्राप्त नहीं हुआ है, बल्कि दूध की चोरी का पाप लग गया है।"
चन्द्रभानु ने दीनता भरे स्वर में पूछा— "स्वामी जी, ऐसा क्यों हुआ? मैंने तो गाय को दान ही कर दिया था। उसका दूध भी कुछ दिन तक तो पंडित रामशर्मा के परिवार ने ही पिया था?"
"तुम जैसे कंजूस लोगों के पापों के लिए भगवान ही प्रत्यक्ष रूप से प्रमाण दे सकते हैं। गोदान के पुण्य ने तत्काल संजीवनी जैसा काम किया और तुम बीमारी से मुक्त हो गये। अगर तुम्हारे अन्दर सद्बुद्धि होती तो तुम इस प्रत्यक्ष प्रमाण के आधार से पुण्यात्मा बन गये होते और दान की महिमा को समझते। पर तुमने स्वस्थ होते ही प्रवंचना करके रामशर्मा से दूध हरण करना आरंभ कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि तुम फिर से बीमार हो गये। अब रामशर्मा के मन में यह भीति है कि स्वस्थ हो जाने पर तुम फिर से उससे दूध माँगोगे। उसके मन का भय ही तुम्हारे नीरोग होने में बाधा बना है।"
"स्वामीजी आप बताइये, मुझे क्या करना चाहिए?" चन्द्रभानु ने पूछा।
"दूध का यह हरण पाप का कारण बन गया है। इस पाप से मुक्त होने के लिए तुम्हें एक और गाय किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान करना होगा।" साधु ने कहा।
"अच्छी बात है। वह गोदान मैं आप को ही कर देता हूँ।" चन्द्रभानु ने कहा।
"मैंने आज तक किसी को दान नहीं किया है, इसलिए दान देने का पुण्य मुझे प्राप्त नहीं।" साधु ने कहा।
"तब तो आप ही बतायें, किस पुण्यात्मा को यह दान देना ठीक होगा?" चन्द्रभानु ने पूछा।
"इस गाँव में तो सब से बड़ा पुण्यात्मा रामशर्मा ही है। उसे दूध दान देने का पुण्य प्राप्त हो गया है।" साधु ने कहा। यह बात सुनकर चन्द्रभानु अवाक् रह गया। साधु मुस्कुरा कर बोला— "तुमने जब गोदान किया, तब उस दान को लेनेवाला व्यक्ति अगर किसी को दूध का दान देता तो तुम्हें उसका पुण्य प्राप्त होता। पर रामशर्मा ने दूध तुम्हें दिया, इसलिए तुम्हें उस दूध को चुराने का पाप लगा है और उस ब्राह्मण को दूध दान करने का पुण्य प्राप्त हुआ है। अब तुम्हें यह कड़वा अनुभव प्राप्त हो चुका है। तुम आज से अपनी कंजूसी छोड़ दो।" साधु ने सलाह दी।
इसके बाद चन्द्रभानु ने बछड़ों सहित दो उत्तम गायें रामशर्मा को दान दीं और अपने अपराध के लिए क्षमा माँगी। चन्द्रभानु शीघ्र ही स्वस्थ हो गया। उस दिन से वह यथोचित दान-पुण्य करते हुए सुखी-स्वस्थ जीवन बिताने लगा।