कर्तव्य (बेताल कथा)
हठी विक्रमार्क पेड़ के पास लौट आया। पेड़ से शव उतार कर कंधे पर डाल सदा की भाँति चुपचाप श्मशान की ओर चलने लगा, तब शव में स्थित बेताल ने कहा— "राजन, आपके अन्दर उदारता का जो गुण है, वह बहुत कम लोगों में पाया जाता है। आप दूसरों के हित के वास्ते जो श्रम उठा रहे हैं, उसे देखने पर आप पर मुझे दया आती है। कभी-कभी ऐसे लोगों से मुसीबत का सामना करना पड़ता है जो उपकार पाकर भी कृतज्ञता प्रकट करने से दूर उलटे वे ही उपकार करने वालों की निंदा करते हैं। इसके उदाहरण के रूप में मैं आपको सौगंध देश के राजा गुणपाल की कहानी सुनाता हूँ। श्रम को भुलाने के लिए सुनिये।"
बेताल यों सुनाने लगा: सौगंध देश के राजा गुणपाल के रणपाल नामक एक पुत्र था। इसी प्रकार उनके मंत्री के लिए जयवर्मा नामक एक पुत्र था और सेनापति के लिए वीरसिंह नामक एक पुत्र था। ये तीनों समान उम्र के थे। एक ही गुरु के यहाँ तीनों ने सारी विद्याएँ सीखीं। पहले ही यह निर्णय हो चुका था कि रणपाल जब गद्दी पर बैठेगा, तब उसके होने वाले मंत्री जयवर्मा तथा सेनापति वीरसिंह होंगे।
युवराजा रणपाल एक दिन मंत्री-पुत्र जयवर्मा, सेनापति के पुत्र वीरसिंह तथा थोड़े से परिवार को साथ लेकर शिकार खेलने जंगल में गया। सूर्योदय के साथ उन लोगों ने शिकार खेलना शुरू किया और शाम तक वे लोग शिकार खेलते रहे। शिकार खेलते वक्त रणपाल भूख-प्यास तक की चिंता नहीं करता। उस दिन रणपाल कई खूँख्वार जानवरों तथा हिरणों का शिकार करके खूब थक गया था। संध्या के समय एक बाघ झाड़ी की ओट में से अचानक रणपाल पर हमला कर बैठा। रणपाल उस हमले का सामना करने को तैयार न था। थोड़ी सी असावधानी हो जाने पर वह निश्चय ही बाघ के मुँह में चला जाता; लेकिन ऐन मौके पर सेनापति के पुत्र वीरसिंह ने बाघ का सामना करके उसे मार डाला।
इस पर रणपाल ने वीरसिंह को गले लगाकर कृतज्ञता प्रकट करते हुए कहा— "दोस्त, आज तुमने मेरी जान बचाई! तुम इस वक्त मेरे साथ न होते तो मैं जरूर बाघ के मुँह में चला गया होता।"
इस पर वीरसिंह ने प्रसन्नतापूर्वक उत्तर दिया— "युवराज, यह तो मेरा कर्तव्य है।"
इसके बाद रणपाल अपने परिवार के साथ राजधानी की ओर चल पड़ा। रणपाल और मंत्री पुत्र जयवर्मा आगे चल रहे थे और सेनापति का पुत्र वीरसिंह परिवार के एक खास आदमी से बातचीत करते हुए पीछे चल रहा था। उस वक्त एक पेड़ की ओट में से सवेरे के शिकार में घायल हुई एक बाघिन ने अचानक रणपाल पर हमला कर दिया। रणपाल ने बाघिन का सामना करने के लिए तलवार खींची, मगर बाघिन के पंजे की चपेट में आकर नीचे गिर गया। इस पर मंत्री के पुत्र जयवर्मा ने झट से नीचे गिरी तलवार को लेकर बाघिन के कलेजे पर वार किया, चोट खाकर बाघिन उसी वक्त ठंडी हो गई।
उस वक्त वीरसिंह थोड़ी दूर पर था। इसे देख वह दौड़े-दौड़े घटनास्थल पर पहुँचा और एक बार फिर युवराज के द्वारा खतरे से बचने के एवज में उनका अभिनंदन किया, साथ ही अपनी खुशी जाहिर की।
दूसरे दिन राजधानी की जनता ने युवराज के प्राण बचाने के उपलक्ष्य में वीरसिंह और जयवर्मा का अनेक प्रकार से अभिनंदन किया। राजा गुणपाल ने एक सभा बुलाई जिसमें वीरसिंह और जयवर्मा को निमंत्रण भेजा। उस वक्त दरबार में उपस्थित सेनापति तथा मंत्री ने सोचा कि उनके पुत्रों का भारी पैमाने पर अभिनंदन होगा। यह सोचकर वे मन ही मन खुश हो रहे थे। पर राजा गुणपाल ने एक बार सभी दरबारियों की ओर अपनी दृष्टि दौड़ाकर कहा— "आप सबने सुना होगा कि मेरे पुत्र युवराज रणपाल को शिकार खेलते वक्त भारी खतरों का सामना करना पड़ा था। मेरे पुत्र की जान बचाने के उपलक्ष्य में मैं मंत्री के पुत्र जयवर्मा को यह रत्नहार उपहार में देता हूँ और उसका अभिनंदन करते हुए उसके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करता हूँ, लेकिन सेनापति के पुत्र वीरसिंह को इस बार क्षमा कर देता हूँ।"
राजा के मुँह से ये बातें सुनकर सारे दरबारी अचंभे में आ गये। क्योंकि उन सबने सोचा था कि राजा जयवर्मा के साथ वीरसिंह का भी सम्मान करेंगे।
बेताल ने यह कहानी सुनाकर कहा— "राजन, सौगंध राजा गुणपाल का यह व्यवहार कुछ विचित्र सा मालूम नहीं होता? राजा ने जयवर्मा को तो पुरस्कृत किया, जिसने सिर्फ युवराज की गिरी हुई तलवार उठाकर हमला किया था, लेकिन वीरसिंह जिसने अपनी जान पर खेलकर पहली बार बाघ को मारा था, उसे न केवल नजरअंदाज किया बल्कि 'क्षमा' करने की बात कही। क्या राजा पक्षपाती था या वह वीरसिंह से जलता था? यदि तुम जानते हुए भी इस प्रश्न का उत्तर नहीं दोगे, तो तुम्हारा सिर टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा।"
विक्रम ने उत्तर दिया— "राजा न तो पक्षपाती था और न ही मूर्ख। वीरसिंह सेनापति का पुत्र था और उसका भविष्य में सेनापति बनना तय था। राजा की रक्षा करना उसका 'कर्तव्य' था। जब रणपाल ने उसे धन्यवाद दिया, तब वीरसिंह ने स्वयं कहा था कि यह उसका कर्तव्य है। कर्तव्य पालन के लिए पुरस्कार की अपेक्षा नहीं की जाती। दूसरी ओर, जयवर्मा मंत्री का पुत्र था, उसका काम युद्ध करना या शिकार में राजा की रक्षा करना नहीं, बल्कि सलाह देना था। उसने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर साहस दिखाया, इसलिए वह पुरस्कार का पात्र था। वीरसिंह से अनजाने में यह चूक हुई कि वह युवराज के पीछे रह गया, जिससे दूसरी बार हमला हुआ। इसीलिए राजा ने उसे पुरस्कृत करने के बजाय 'क्षमा' किया क्योंकि वह अपने रक्षक के कर्तव्य में थोड़ा लापरवाह रहा था।"
विक्रम के सही उत्तर देते ही बेताल शव के साथ वापस पेड़ पर जा उड़ा।