कपट योगी
प्राचीन काल में कुरु राज्य की राजधानी पांचाल नगरी पर रेणुक नामक राजा राज्य करते थे। उन्हीं दिनों में हिमालय में पाँच सौ साधुओं के गुरु महारक्षित नामक तपस्वी भी रहा करते थे।
एक बार महारक्षित अपने शिष्यों के साथ देशाटन करते हुए पांचाल नगर में आ पहुँचे। साधुओं के आगमन पर राजा बहुत खुश हुए। महारक्षित का उचित रूप से स्वागत-सत्कार करके उद्यान वन में उनके ठहरने का अच्छा इंतजाम किया। वर्षा ऋतु के बीतने तक महारक्षित उद्यान वन में रहे, इसके बाद राजा से विदा लेकर हिमालय की ओर चल पड़े। वापसी यात्रा में सभी लोग एक पेड़ की छाया में बैठकर राजा के सत्कार की चर्चा करने लगे। बातों के सिलसिले में यह प्रसंग आया कि राजा के कोई संतान है या नहीं! इस पर महारक्षित के कुछ ज्योतिषी शिष्यों ने चर्चा शुरू की। उस संदर्भ में महारक्षित ने बताया कि थोड़े दिन बाद राजा रेणुक के यहाँ देवता अंश वाला एक पुत्र जन्म लेगा।
सब शिष्य यह जानते थे कि महारक्षित के मुँह से जो बात निकलती है, वह सच होती है। ये बातें सुनने पर महारक्षित के एक शिष्य के मन में दुर्बुद्धि पैदा हो गई। उसने अन्य शिष्यों से बताया कि वह थोड़ा पीछे उनके साथ चलेगा, तब सबके चले जाने पर वह पांचाल नगर को लौट पड़ा। राजधानी में पहुँचकर राजा के दर्शन करके उसने कहा— "महाराज, जब हम लोग हिमालय को लौट रहे थे, तब अचानक हमें आपकी याद आई। हमारे सामने यह प्रश्न उठा कि राजा की वंश-लता आगे बढ़ेगी या नहीं? हमने अपनी दिव्य दृष्टि से जान लिया कि आपके यहाँ देवता अंश वाला एक पुत्र पैदा होगा! यही बात मैं आपको बताने आया हूँ।" यों कहकर वह दुष्ट साधु लौटने को हुआ।
यह शुभ समाचार सुनकर राजा बहुत प्रसन्न हुए और साधु को रोककर बोले— "महात्मा, आप तो दिव्य चक्षु वाले हैं! आप कृपया यहीं पर रह जाइये।" इस पर दुष्ट बुद्धि वाले योगी ने राजा की बात मान ली। राजा ने उद्यान वन में उस योगी के ठहरने के लिए सारी सुविधाएँ कर दीं और उसकी सेवा करने लगे। वह धूर्त योगी उद्यान के एक कोने में साग-सब्जी पैदा करके मालियों के हाथ उसे बिकवाकर धन कमाने लगा।
उन्हीं दिनों में बोधिसत्व रेणुक राजा के पुत्र के रूप में पैदा हुए। उनका नामकरण सुमनस किया गया। सुमनस जब सात साल के हुए, तब राजा रेणुक को अपने सामंत राजाओं के साथ युद्ध करना पड़ा। राजा की गैर-हाजिरी में एक दिन सुमनस उद्यान वन को देखने गये। वहाँ पर गेरुए वस्त्रधारी योगी पौधों के लिए थाँवले बनाकर माली से भी कहीं ज़्यादा मेहनत करते दिखाई दिया। सुमनस ने कपट योगी को पहचान लिया और उसे उचित सबक सिखाने के ख्याल से बोले— "अरे माली, तुम क्या करते हो?"
दिव्य चक्षु वाले के रूप में प्रसिद्ध वह धूर्त योगी सुमनस की यह पुकार सुनकर चौंक पड़ा। उसने भांप लिया कि सुमनस ने उसके रहस्य को समझ लिया है। उसी वक्त सुमनस का अंत करने का निश्चय करके योगी ने एक उपाय सोचा। युद्ध भूमि से राजा के लौटने का समाचार पाकर कपट योगी ने अपने कमण्डलु और आसन के टुकड़े-टुकड़े कर दिये। साथ ही आश्रम के चारों तरफ घास-फूस फेंक दी। इसके बाद सारे बदन में तेल मलकर कराहते हुए एक कोने में लेट गया।
लड़ाई से लौटकर राजा अपने गुरु को देखने गये। उन्हें आश्रम का परिसर गंदा दिखाई दिया। आश्रम के भीतर योगी कराहते हुए लेटा था। इस पर राजा ने हाथ जोड़कर पूछा— "महात्मा, कृपया बताइये, आखिर क्या हो गया है?"
"महाराज, यह सब आपके पुत्र की करनी है!" इन शब्दों के साथ कपट योगी ने सुमनस पर कई झूठ-मूठ के इल्जाम लगाये। राजा क्रोध में अंधे हो गये और उसी वक्त वधिकों (जल्लादों) को बुलाकर आदेश दिया— "तुम लोग सुमनस का सर काटकर मेरे पास ले आओ।"
उस वक्त सुमनस अपनी माँ के पास बैठे थे। वधिकों ने जाकर सुमनस को यह खबर सुनाई।